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Manoshi Hindi Page

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स्मृतियों का आँगन

नि:ष्प्राण हृदय में स्मृति तुम्हारी
बनी है जल दीपों की माला
प्राण नहीं आते फिर फिर से
साथ जो छूटा प्राण भी छूटे


लड़ मृत्यु से आस को बाँधा
आते जाते साँस में बाँधा
कई शत क्षण बंधन के जोड़े
एक क्षण टूटा, संबल छूटे


छली हो कान्हा, मोल नहीं है
जीवन भी क्रीड़ा, लीला है?
हर अक्षत रोली हर टीका
हर अश्रु हर बंधन झूठे?


अंतिम मेरा नमन हे प्रियतम
जीवन का अब मोह रहा न
प्रण की डोरी झूल रही, मैं
देख रही स्वप्नों को रूठे...

earthen_lamp.jpg

स्मृतियों के  आँगन में

 
स्मृतियों के विस्तृत आँगन में
मन मन्दिर के इस प्राँगण में
उस मूरत के छाँव तले अब
इक दीपक चुपचाप जले
 
इक लहराता सा प्रतिबिम्ब
उभरे और हो जाये धूमिल
फिर छलकाती बूँदों के सँग
सरिता सी बन निर्झर झरे
 
आँचल में बँध कर वह कुछ क्षण
स्मृति के काजल में डूबे प्रण
पूनम रूप बिखराती रातें
बन सादी बिरहिनी झरे
 
प्राणों मे गूँथे हों ज्यों स्वर
मधुर राग बन झंकृत हो कर
बज उठे जल तरंग सी हवा
प्रणय गीत बन कर सुर ढले
 
सीमाऒं के बंधन सब तज
आँखों में सुन्दर सपना सज
दबे पाँव आते हो जब तुम
लहरों का उफ़ान चले
जल रहा सब नवैद्य थाल में
स्मृति को गूँथ जीवन माल में
अन्तर में पीड़ा असह्य अब
सपन यथार्थ के गाँव चले
 
आज नहीं मन मेरा जलने को तैयार
 
ठहरे हैं  कुछ क्षण प्रत्याशा में कई बरसों से मेरे द्वारे
आज नहीं पर मेरा मन है फिर से जलने को तैयार
 
छोड़ आयी सोचा था पिछ्ले राहों पर ही सब जंजाल
पर स्मृतियों को बड़े जतन से स्मृतियों में रक्खा संभाल
अब छल से आँखें रिसती हैं और  बूँदें वह चुपके से ही
बार बार धो आती आंगन, खोल कठिन स्वप्न जाल
उठ जाते हैं पग मेरे क्यों पीछे चलने को हर बार
आज नहीं पर मेरा मन है फिर से जलने को तैयार
 
बाँध तोड कर झरे नयन, पर हृदय अहं का मारा था
इस वर्षा में भीगे कोई और नहीं गवारा था
मेरे दर्द और उसकी पीडा के द्वंद में उलझ कर
अश्रु बन बहने से पहले प्रेम जल कर हारा था
लिपट कर स्मृतियों से मन मचल रहा बार बार
आज नहीं पर मेरा मन है फिर जलने को तैयार

वो लम्हें
 
हर लम्हा कहीं
एक टूटे-फूटे से
दर्द का एह्सास दिलाता है
वो जो छूट गया कभी
आज भी
मेरे इर्द्-गिर्द मंडराता है
मैं झटक कर फेंक दूँ मगर
चिपक कर उसका कोई हिस्सा
जो जुडा छूटता ही नहीं
फिर किसी  पुरानी रात का साया
मेरे छत पर मंडराता है
दूर फेंक चुकी थी मैं उसे
कही से किसी ने उछाल दिया फिर
लपक कर ना पकडूँ सोच कर भी
गिरने ना दे सकी उसे
कभी जो मेरा हिस्सा था
आज कोई छोर मेरी छोटी उँगली
के एक कोने से बँधा इठलाता है
झटक कर छुडा लूँ मैं
मगर ऎसा बँधा कि छूटता ही नहीं
इसी उम्मीद में कटती है
मेरी हर शाम
कि कभी तो हो शामे मेरी
साफ सुथरी और हल्की
कभी तो ये सामान उतारूँ मैं
और उडूँ आसमान में
एक खुले परिन्दे की तरह्...
 

मूसलाधार बारिश
 
कल की शाम बड़ी भारी थी
मूसलाधार बारिश में
कहीं बहुत कुछ भीग रहा था
हर पंखुडी पर जमा थी कई
पुराने उधडे लम्हों की दास्तां
एक छोटा सा लम्हा टपक पडा
किसी पंखुडि के कोने से
बडा सहेज कर रखा था
मैने उस लम्हें को
छितर गयी वो बून्द आज
कि उस बून्द के पीछे
बून्दों का सिलसिला जो चल पडा
एक रुका हुआ सैलाब
बाँध तोड कर टूट पडा
कि बहुत दिनो बाद बारिश हुई थी
मूसलाधार बारिश....

बस एक बार...
 
कई दिनों से
ख़्वाब एक बुन रही हूँ
हर एक धागे के साथ
जुड़ रही हैं कहानियाँ
आड़े तिरछे लकीरों सा
कहीं कुछ बन रहा है
एक आकार देने की
कोशिश में लगी हूँ
उस शाम से जब शुरु हुई थी
ये कहानी अनजाने ही
आज भी मन ही मन
छू आती हूँ उन पलों को
तब एक और ताना
बुन जाता है मेरे ख़्वाब में
मगर एक बाना फिर
बिखर जाता है दूसरे ही पल
चलो, आज ख़तम कर दो
ये कहानी तुम ही
मुझसे बस एक बार कह दो प्रियतम
और कह कर रोक लो
एक पल होठों पर
फिर छू लेने दो
मुझे उस पल को
बस एक बार, बस एक बार...

drop.jpg

 
मैं तो एक आवारा कण हूं
 
मैं एक बेघर आवारा कण हूं
सीप की गोद में आ ठहरा हूं
बरसों बाद मोती बन कर
तुम्हारी पलकों में सजूंगा
और किसी शाम को चुपके से
ढुलक पडूंगा तुम्हारे गालों पर
किसी एक भंवर में उलझ कर
तुम्हारी हंसी को छेडूंगा फिर
बज उठती थी बार बार जो
मेरे झांकने पर पलकों से
एक प्रेम की पाति लिख जाऊंगा
सूखा चिह्न एक छोड जाऊंगा
छू के उसको तब हंस लेना
रेत का कण समझ झटक देना
मेरा क्या जो खो भी जाऊं
मैं तो एक आवारा कण हूं ...

आह, खोने में भी क्या सुख है
 
तिनका-तिनका कर स्वप्न जोड़े
हवा के एक झोंके ने तोडे
आंखों से बह निकला पानी
नहीं समझना हरदम ही दुख है
पीड़ा अनंत के बाद ज्यों मृत्यु
आह! खोने में क्या सुख है

दंश तेज़ दर्द बहुत गहरा
हृदय में जा आजन्म ठहरा
छितरे खुशियों के बीच घुल
विरहाग्नि में तपा सुनहरा
एकांत में आ जाता सम्मुख है
आह! खोने में क्या सुख है

स्पर्श से जो चिंगारी उठी थी
दावानल बन कर जली थी
फिर एक ज्योत बन मद्धम
स्मृतियों में लाड से पली थी
अब बुझी तो क्या शांति अद्भुत है
आह! खोने में क्या सुख है

वो शाम
 
एक भीनी शाम आकर
झकझोर जाती है मुझे रोज़
अपने थपेडों से
भिगो जाती है अंतरंग मेरा
खिलखिलाते बच्चों का समुह्
दो एक जोडे हाथ मे हाथ डाले
चार लडकियाँ घास पर बैठी
अपने मन प्राण की कह्ती
और कहीं से उड आता
किसी पहचानी खुश्बू के
पीठ पर बैठा पुराना एक खयाल
पंख लगाये उड गयी कैसे
मेरी वो शामें
जब उन बच्चोंके शोर की
एक खनक थी मैं भी
कभी उन लडकियों की बजती हँसी
की एक घुंघरू थी मैं भी
किसी के सपनों की धडकन  का सपना बन
फिरती थी रंग भरने अपनए सपनो में
झरती चान्दनी में लिखे थे
जाने कितने गीत मैने
और बरसाती बादल के आगमन के साथ
बहता था मेरी आँखोंसे भी पानी
कितना सुन्दर था वो सच उन आँखों में
आज वही सच बदल गया है
परखने लगी है आँखें आंसुओं का खारापन
सपनों ने  रिश्ते जोडे हैं यथार्थ से
और बरसाती बादल के आगमन से  आज
कपडे न सूखने क डर...
मेरी शामों ने बदली है करवट
पर आज भी देखती हूँ
खिलखिलाते बच्चोंक समुह्
दो एक जोडे हाथ में हाथ डाले
चार लडकियाँ घास पर बैठी
अपने मन प्रान की कह्ती...
 
 

 

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