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कहानी १.

वो एक दिन

" तुम रहे हो ?"

" हाँ बाबा, रहा हूँ , चिन्ता नहीं करो"

" ठीक है, मैं राह देखूँगी। पर तुम्हें पहचानूँगी कैसे?"

" मैंने तुम्हारी तस्वीर देखी है, भरोसा रखो, मैं तुम्हें पहचान लूँगा। और फिर तुमने भी तो देखी है मेरी तस्वीर..."

" उम्म्म, ठीक है..."

एयरपोर्ट पर प्रतीक्षा की नज़रें ढूँढ रही थी सुधीर को। सुधीर को उसने कभी देखा नहीं था। कोई एक साल तक लगातार बातें की थी उसने सुधीर से। आज की तकनीकी दुनिया में कम्प्यूटर पर और फ़ोन पर बात कर के एक इन्सान को कुछ हद तक जाना तो जा सकता है मगर कभी मिलने का मौक़ा नहीं मिला था सुधीर से। इन्टरनेट के माध्यम से ही मुलाक़ात हुई थी दोनों की। पहचान बढ़ते बढ़ते दोस्ती तक जा पहुँची थी। आज प्रतीक्षा मुंबई जा रही थी। उसके बचपन की सहेली की शादी थी। सुधीर को एयरपोर्ट पर आने को कहा था उसने। हमेशा दोनों के मिलने की चाह को पूरा करने का ये मौक़ा संयोगवश मिल गया था उन दोनों को।

एयरपोर्ट पर जब सुधीर को तलाशती प्रतीक्षा की निगाहें जवाब दे चुकी तो उसने उसके मोबाइल पर फ़ोन मिलाया। " कहाँ हो?" " "मैं यहीं हूँ, तुम कहाँ हो?" " मैं भी यहीं हूँ, सामान ले रही हूँ, अभी बाहर आती हूँ।"

गाड़ी में बैठ कर प्रतीक्षा रोक नहीं पाई खुद को पूछने से, " क्या मैं तस्वीर से अलग दिखती हूँ?"

" नहीं, बिल्कुल वैसी ही तो हो।"

" अच्छा क्या तुम मुझे सीधे घर छोड़ रहे हो?"

" कहो, कहाँ जाना है।"

" काफ़ी ले लेते हैं।"

"ठीक है।"

काफ़ी की दुकान में काफ़ी भीड़ थी। काफ़ी ले कर प्रतीक्षा सुधीर के पीछे पीछे बाहर यी। पार्किंग लाट में खड़ी गाड़ी में सुधीर के पास सामने वाली सीट पर बैठी प्रतीक्षा ने अपनी काफ़ी के कप से एक चुस्की लगाई। सुधीर ने अपनी काफ़ी की तरफ़ एकटक देखते हुये कहा," और सुनाओ, क्या चल रहा है।"

" बस ठीक।"

" इससे ज़्यादा बातें तो तुम फ़ोन पर करती हो।"

" उम्म्म, हाँ, शायद फ़ोन पर अपने होने का अहसास दिलाना होता है, इसलिये। यहाँ ऐसा नहीं है"

" हाँ, शायद। चलो एक जगह ले चलता हूँ, जल्दी तो नहीं है?"

" कहाँ? नहीं, जल्दी नहीं है।"

सुनसान से पार्क में प्रतीक्षा सुधीर के पास एक बेंच पर बैठी सुंदर शाम को ढलते देख रही थी। अचानक सुधीर की आवाज़ ने उसकी तंद्रा तोड़ी।

" तुम अच्छी लड़की हो प्रतीक्षा"

" तुम भी तो अच्छे हो", एक हल्की मुस्कुराहट के साथ बस इतना ही कह पाई प्रतीक्षा।

" अगर ये कहूँ कि मुझे तुमसे आकर्षण सा हो रहा है तो ग़लत नहीं होगा।"

" उम्म्म"

"मुझे तुममें सबसे अच्छी बात तुम्हारी फ़ेमिनिनिटी लगती है। तुम बहुत फ़ेमिनिन हो"

"वो तो सभी लड़कियाँ होती हैं, है न?"

"हाँ, सभी होती हैं, मगर कोई ज़्यादा, कोई कम"

"उम्म्म"

"अच्छा, चलो चलें। देर हो जायेगी अब तुम्हें"

" हाँ, चलो"

पार्क के ऊँचे नीचे रास्तों पर से चलते हुये अचानक प्रतीक्षा का हाथ पकड़ लिया सुधीर ने। शरीर में उठे उस कँपकँपी को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करने के बीच उसने सुधीर को कहते सुना," चलो हाथ पकड़ कर ले चलता हूँ।" प्रतीक्षा थोड़ी देर कुछ कह नहीं पाई मगर फिर धीमी आवाज़ में ख़ुद को कहते सुना," हम दोनो के बीच कोई अनकहा संबंध है, हाथ नहीं पकड़ो।"

"ठीक है बाबा, जैसा तुम कहो।"

शादी के झमेलों के बीच भी प्रतीक्षा ने कई बार सुधीर को फ़ोन करने की कोशिश की मगर हर बार फोन सुधीर के जवाबयंत्र पर जाता। एक दो संदेश छोडे प्रतीक्षा ने मगर कोई जवाब नहीं आया। उसकी सहेली की शादी धूमधाम से हो गयी। शादी के दो दिन बाद का प्लेन पकड़ना था प्रतीक्षा को। रात को सबके साथ बैठ कर एक सिनेमा देखते हुये अचानक अपने कमरे में बज रही अपने मोबाइल फ़ोन की तेज़ घंटी प्रतीक्षा के कानों तक पहुँची। भाग कर फ़ोन उठाया प्रतीक्षा ने और सुधीर की आवाज़ सुन कर एक बार फिर कँपकँपी सी दौड़ गयी उसके जिस्म में।

" और क्या हो रहा है?"

" कुछ नहीं, सिनेमा देख रही थी"

"अच्छा, कौन सी? "

"अंग्रेज़ी"

"अच्छा, और कैसी हो?"

"ठीक हूँ, हाँफ़ रही हूँ, दौड़ कर आई हूँ। पता, कमरे का दरवाज़ा बंद कर के बात कर रही हूँ तुमसे, कोई क्या सोचेगा"

" अरे! क्या सोचेगा, कुछ नहीं। तुम बहुत ज़्यादा सोचती हो"

" चलो कुछ भी सोचे, आइ डोंट केयर"

"क्या हो गया है तुम्हें, प्रतीक्षा?"

"पता नहीं सुधीर, कुछ महसूस कर रही हूँ"

"अच्छा, और मुझे नहीं बताओगी"

"क्या"

"यही जो महसूस कर रही हो"

"मगर मैं ऐसा महसूस नहीं करना चाहती"

"अच्छा? चलो ज़्यादा सोचो नहीं। ऐसा होता है, ये कुछ नहीं है। सिर्फ़ नई नई मुलाकात है इसलिये। तुम ठीक हो"

"हाँ, ऐसा ही होगा शायद"

प्रतीक्षा अचानक धीरे से कह उठी," सुनो"

"हाँ"

"तुम कल आ जाओ, तुम्हें लंच करवाती हूँ, कहीं बाहर"

"ठीक है, कल लेने आ जाउँगा तुम्हें"

"ठीक है, बारह बजे आ जाना, मैं इंतज़ार करूँगी"

"ठीक है फिर, कल मिलते हैं"

"ओके, बाय"

रात पास सोये चांदनी ने कब बिस्तर छोडा और कब भोर की किरण आ पड़ी प्रतीक्षा के सिरहाने, उसे पता नहीं चला। दोपहर के बारह बजे सुधीर गाड़ी ले कर हाज़िर था। गाड़ी में बैठ कर प्रतीक्षा ने कहा," कापर चिमनी चलें?"

"नहीं, ऐसा करते हैं, कुछ ले लेते हैं और उसी पार्क में चलते हैं। वहीं खा लेंगेज़्यादा भूख तो नहीं है?

"नहीं"

"ठीक है फिर"

दोपहर के सन्नाटे में पार्क के एक कोने में गाड़ी खड़ी कर सुधीर ने कहा," हाँ अब कहो"

"कुछ नहीं, क्या कहूँ"

"'तुम्हें पता है, प्यार ऐसे नहीं होता। हम सोचते हैं ग़लती से कि ये प्यार है, पर ये सिर्फ़ आकर्षण होता है, शारीरिक आकर्षण"

"क्या पता शायद होता हो, मगर मुझे ऐसा नहीं लगता, मुहब्बत तो कभी भी हो सकती है"

"हाँ, औरतें ऐसा सोच लेती हैं जल्दी, मगर आदमी ऐसा नहीं सोचते, आकर्षण और प्यार में फ़र्क करना जानते हैं।"

"उम्म्म, अच्छा। पता नहीं, कभी इतना सोचा नहीं इस बारे में। खै़र, तुम्हारा हाथ दिखाओ" प्रतीक्षा सुधीर के हाथ को अपने हाथ में ले कर देखने लगी, फिर हँस उठी " तुम्हारा हाथ है कि हथौडा, बाप रे कितना बड़ा है, मेरा देखो, तुम्हारे हाथ के सामने कितना छोटा सा है"

"हाँ, ऐसा ही होता है" सुधीर की मुस्कराहट को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाई प्रतीक्षा।

कब प्रतीक्षा का हाथ सुधीर के हाथ मॆं ही रह गया, प्रतीक्षा को ख़बर नहीं हुई। सुधीर को कहते सुना उसने बार बार," नहीं...भले ही मुश्किल है खुद को रोकना मगर मैं नहीं चाहता कि हम बाद में पछतायें। और फिर ये प्यार नही है। छलावा, ये सिर्फ़ छलावा है"

प्रतीक्षा ने धीरे से सुधीर के बोलते होठों को छू लिया। और फिर एक पल को उसने सुधीर के उँगलियों की छुअन अपने होठों पर महसूस की मगर दूसरे ही पल सब कुछ सामान्य था।

अचानक ख़ामोशी को तोड़ती सुधीर की आवाज़ प्रतीक्षा के कानों में पड़ी," चलो चल कर कुछ खा लें, फिर तुम्हें घर छोड़ दूँगा"

घर के पास गाड़ी से उतरते समय प्रतीक्षा सुधीर को बस इतना ही कह पाई," धन्यवाद सुधीर, मेरा खयाल रखने के लिये। दिल्ली पहुँच कर मुझे अपने पति का सामना करने योग्य छोड़ने के लिये। ये दिन मुझे हमेशा याद रहेगा। शुक्रिया।"

सुधीर ने मुस्करा कर अपनी गाड़ी में चाभी लगायी, और हवा में हल्के से हाथ हिला कर सर्राटे से चल दिया।

कहानी २.

आशंका

लडका कनाडा में रहता है। इन्जीनियर है और मां-बाप का इकलौता संतान। अट्ठाइस साल की उम्र तक अपने सांवले रंग की वजह से बिन ब्याही एमन के लिये जब ये रिश्ता घर बैठे आया तो, हां कहने के अलावा उसके मां-बाप के पास कोई और जवाब था ही नहीं। लडके के पास इतनी छुट्टी नहीं है कि शादी से पहले लडकी देखने आ सके, ऐसा कहा था लडके के घर वालों ने। एमन की मां को होने वाले जंवाई को देखने की इच्छा को दबा देना पडा था कि कहीं इस इच्छा के ज़ाहिर करने से बेटी का रिश्ता ही न टूट जाये और बेटी बिन-ब्याही ही न रह जाये।  एमन से दो साल छोटी उसकी बहन रागेश्री के लिये भी रिश्ते आ रहे थे मगर बडी बेटी को घर में बिठा कर छोटी की शादी नहीं कर पा रहे थे वे। लडके ने एमन की तस्वीर देखी थी, और रिश्ता पक्का होने से पहले एमन को फ़ोन भी किया था। एमन को भी फोन पर दीपक की बातचीत का तरीका काफ़ी भद्र और अच्छा लगा था। दीपक की तस्वीर भी बहुत सुंदर थी और एमन को कोई एतराज़ नहीं था इस रिश्ते से।

दीपक उस से लगभग ५ साल बडे थे और कनाडा में अब कोई ९-१० साल से रह रहे थे। रिश्ता तय होने के कुछ ही दिनों बाद दीपक का उसके नाम खत भी आया था जिसके साथ उन्होंने अपनी कुछ और तस्वीरें भी भेजी थीं और अपना ई-मेल का पता भी दिया था। एमन को अपने जीवन में अचानक आयी इस नयी खुशी को कबूल करने में थोडा डर लग रहा था। शादी से पहले वो दीपक के प्रेम में नहीं पडना चाहती थी। हमेशा की तरह ही, तरह तरह की आशंकायें उसके मन को आगे बढने से रोक देती थीं। क्या हुआ जो ये शादी आखिरी वक़्त पर जा कर टूट गयी तो? या ज़्यादा बातचीत करने से कोई बात दीपक को बुरी लग गयी और उन्होंने अपने निर्णय पर फिर से विचार करना शुरु कर दिया तो? इन्हीं सब खयालों के चलते उसने दीपक को कोई खत नहीं लिखा था और न ही कभी खुद फ़ोन किया था। मगर दीपक के फ़ोन आते रहते थे। एमन के घर कम्प्यूटर नहीं था। दीपक ने उसे कई बार ई मेल करने की बात कही थी। ई-मेल का मतलब था कि उसे किसी नेट कैफ़े में जाना पडता। उसके स्कूल में जहां वो पढाती थी , ई-मेल की सुविधा शिक्षकों के लिये उपलब्ध नहीं थी। फ़ोन पर भी वो ज़्यादा बात नहीं करती थी दीपक से मगर दीपक उसे बिना भूले हफ़्ते में २ बार ज़रूर फ़ोन कर लिया करते थे। बातचीत भी क्या होती थी। यूं ही इधर उधर की, उसके स्कूल की और कनाडा के मौसम की, मगर हर बार फ़ोन रखने पर उसे एक हल्के से दर्द का अहसास होता था और वो इस बात को अनदेखा करती थी।

अब बस एक ही महीना रह गया था शादी को। एमन के लिये उसकी मां ने गहने और कपडे खरीद लिये थे और एमन ने अपनी शादी के लिये अपनी पसंद से एक लाल रंग की बनारसी साडी खरीदी थी। दुल्हन लाल में ही अच्छी लगती है, ऐसा मानना था उसका। कई बार चुपके से आईने में उस साडी का घूंघट ओढ कर देख चुकी थी वो। इस बीच उसने दीपक को कुछ ई-मेल भी भेजे थे। पास ही के नेट कैफ़े में जा कर कई बार आनलाइन चैट भी की थी उसने दीपक से। पर हर बार चैट के बाद यही लगता था उसे कि क्या होगा अगर किसी वजह से उसकी शादी यहां नहीं हुई। उसकी तस्वीर में उसका सांवला रंग काफ़ी छुप गया था। दीपक को अभी तक ये भी तो पता नहीं था कि उसके बायें पैर में ६ उंगलियां हैं। मगर अब वो इस रिश्ते के टूटने की बात को सोचने से भी डरती थी। दीपक से उसकी शादी न हुई तो वो कभी शादी नहीं कर पायेगी, ऐसा लगता था उसे। उसने दीपक के लिये कुछ तोहफ़े भी इकट्ठा किये थे। एक छोटी सी नाचते हुये गणेश की मूर्ति जिसके पीछे पेन लगाया जा सकता था, एक रुमाल जिसपे उसने खुद दीपक कढाई कर लिखी थी, एक छोटी सी मैच बाक्स गाडियों का सेट, आदि। दो हफ़्ते में दीपक भारत आ रहे थे। अभी शादी होने के बाद कम से कम तीन महीने वीसा मिलना मुश्किल था। यानि कि उसे शादी के बाद अपने घर रहना पडेगा ३ महीने। दीपक के माता-पिता शादी के बाद दीपक के साथ कनाडा जा रहे थे ३-४ महीनों के लिये।

दीपक ने भारत आते ही एमन को फ़ोन किया था। एक ही शहर में घर होने की वजह से एमन को यकीं था कि दीपक उससे मिलने की बात करेंगे। मगर दीपक ने ऐसी कोई बात नहीं की। फ़ोन पर उन्होंने उससे ढेरों बातें की मगर मिलने की कोई बात नहीं की। एमन की जान में जान आयी। मगर उसे अचरज भी हुआ कि दीपक ने उससे मिलने की बात क्यों नहीं की। एमन के घर वालों ने एक बार दीपक के माता-पिता से कहा भी कि अगर लडका लडकी से मिलना चाहे तो। मगर, उन्होंने जवाब दिया कि लडका बहुत बिज़ी है और शादी के मंडप में ही मिलेगा। थोडा अचरज तो सभी को हुआ था मगर एमन के मन की निश्चिंतता का किसी को पता नहीं था। अब तो दीपक से रोज़ ही बात होती थी और कई बार २ घंटे तक। मगर न दीपक ने कभी एमन से मिलने की बात की न एमन ने।

और देखते देखते शादी का दिन भी आ गया। एमन के घर रिश्तेदारों की भीड थी और कोई एक हफ़्ते से दीपक का फ़ोन भी नहीं आया था। मगर दीपक के घर वाले और उसके मातापिता रोज़ ही किसी न किसी काम को लेकर बात करते थे। शादी के दिन एमन अपने ही घर को पहचान नहीं पा रही थी। मंडप फूलों का बना था और जैसे तारे उतर पडे थे उसके घर के आंगन में । शाम को उसके श्रृंगार के लिये पास के ब्यूटी पार्लर से कुछ लडकियां आयीं थी और उसने पहले ही ज़्यादा लीपापोती से मना कर दिया था। उसे पता था कि उसका सांवला रंग और उभर कर दिखता है मेकप से। उस सांवले रंग को ढकने की उसकी कोशिश के उसके अनुभव को कोई मात नहीं दे सकता था। लाल रं ग की साडी में, हल्के साज-श्रॄंगार के साथ, रजनीगंधा फूलों की माला पहने उसे अपने रूप पर एक बार गर्व हो आया। अगर वो सांवली नहीं होती तो शायद अप्सरा होती, इसी लिये उसे भगवान ने सांवला बनाया होगा। अपने मन को ऐसी सांत्वना वो पहले भी कई बार दे चुकी थी।

दीपक के साथ जयमाल के वक़्त, वो दीपक को एकटक देखती रह गयी थी। दीपक ने उसे क्यों चुना। ऐसा सुंदर, सौम्य, शालीन पुरुष उसने अपने जीवन में पहले नहीं देखा था। और दीपक का जयमाल के वक़्त उसे देख कर हल्का सा मुस्काना उसके दिल में अजीब सी हलचल पैदा कर गया था। अब एमन दीपक के प्रेम पाश में खुशी खुशी बंध सकती थी। कुछ भी हो, अब उसकी शादी हो रही थी और उसने अपने आप को पूरी तरह मन से समर्पित कर दिया दीपक को।

ससुराल में एमन का आवभगत बडे ही अच्छे तरीके से किया गया था। दीपक की मां ने उसे रिवाज़ अनुसार घर की चाभी सौंप  दी थी और साथ ही दीपक का हाथ भी उसके हाथ में दे दिया था और कहा था, मेरे इस पागल बेटे को संभाल लेना। हल्का सा शरमा गयी थी एमन तब। दीपक के साथ हनीमून जाने का अवसर नहीं मिल पाया था उसे। दीपक ने कहा था कि उसकी छुट्टियां बहुत कम हैं और इसलिये वो इस कमी को एमन के कनाडा आने पर पूरी कर देगा। एमन ने कभी कोई सपने नहीं देखे थे इसलिये उसे इस बात से कोई परेशानी नहीं थी  कि वो दुनिया के नये रिवाज़ों को पूरा करने हनीमून मनाने नहीं जा रही है। दीपक उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते थे और उसकी हर इच्छा का खयाल रखते थे। शादी की रात को उसके बांये पैर की ६ उंगलियां देख कर उन्होंने सहज भाव से कहा था,"तुम्हें पता है? लडकियों के बायें पैर में ६ उंगलियां हो तो उसे बहुत भाग्यशाली माना जाता है।" एमन का तब मन हुआ था कि वो दीपक के चेहरे को अपने दोनों हाथों से पकड कर उनकी आंखों को चूम ले, मगर वो ऐसा कर नहीं पायी थी। अभी भी वो दीपक से दूरी पूरी तरह मिटा नहीं पायी थी। दीपक ने उसके तोहफ़े बडी जतन से लिये थे और उसे भी एक तोहफ़ा दिया था, हीरे का एक सेट। एमन को अपने तोहफ़ों की याद कर ज़रा सी शर्म आयी थी, मगर उसे उसने अपने चेहरे के भावों तक आने नहीं दिया था।

शादी के बाद दीपक एमन के साथ एक हफ़्ता ही रह पायी थी और उसे एक हफ़्ते में ही वापस अपने घर आ जाना पडा था।  दीपक उसे उसके माइके छोडने आये थे और जाते वक़्त उसे एक लिफ़ाफ़ा जिसमें कुछ हज़ार रुपये थे और एक चेकबुक दे गये थे। एमन के लिये वीसा का बंदोबस्त अभी तक नहीं हुआ था मगर दीपक ने उसे सारे नियम और आवेदन के तरीके आदि बता दिये थे। भारी मन से उसने दीपक को विदा किया था और अगले दिन वो दीपक के बिना, नयी दुल्हन मा-बाप के घर बैठी थी, बिल्कुल पहले जैसे ही बस फ़र्क़ ये था कि अब उसकी साजो-पोषाक अलग थी और मन कहीं दूर जा चुका था उसके अपने शरीर से।

दीपक के जाने के अगले दिन ही उसके फ़ूफ़ा जी उनके घर आये थे। शादी की तस्वीरें देख कर उन्होंने जंवाई के रूप की तारीफ़ की थी मगर बातों बातों में कहीं ये आभास दिला गये थे कि ऐसा क्या है एमन में कि दीपक ने उसे चुना। कहीं कोई छुपी बात तो नहीं? एमन के पिता के ये कहने पर की लडका तो बहुत अच्छा है, वे ये कहने से बाज़ नहीं आये थे कि अमेरिका-कनाडा के लडकों से अपनी बेटी की शादी करने से पहले गहराई से छान बीन कर लेना अच्छा होता है। क्या आपने उसकी इन्जीनियरिंग की डिग्री देखी? क्या लडका सचमुच वहां इन्जीनियर ही है?
एमन के पिता के पास कोई जवाब नहीं था। एमन को अपने फूफा जी पर बहुत गुस्सा आया था उस वक़्त। और अपने पिता पर और भी ज़्यादा कि वो चुपचाप सुन रहे थे अपने बहनोई की बातों को। वो शाम ज़रा कठिन गुज़री थी उसके घर। सभी परेशान से थे उसके घर में। एमन को समझ आ रहा था कि उसके मां और पिताजी में इस सिलसिले में गंभीरता से बातें हुई हैंऔर वो दोनों उसके सामने सामान्य रहने की कोशिश कर रहे हैं। मगर क्या उन्हें इस सब के बारे में पहले नहीं सोचना था? अब जब शादी हो चुकी है तो इन बातों का क्या फ़ायदा, और जब कि दीपक इतने अच्छे हैं और उससे प्यार भी करते हैं। मगर घर में अब तनाव सा हो गया था। रागेश्री भी होस्टल वापस लौट गयी थी और एमन किसी से अपने दिल की बात कहने में असमर्थ थी। अगले दिन दीपक का फ़ोन आया था और घर में जब मां ने दीपक से प्यार से बात की थी तो उसे लगा था कि कहीं छल हो रहा है दीपक के साथ। उस पर शक किया जा रहा है मगर ऊपर से सब मीठी बातें कर रहे हैं। मगर उसने बहुत प्यार से और मन से बातें की थी दीपक से। दीपक ने जाने से पहले किया वादा निभाया था कि वो हफ़्ते में दो बार उसे फ़ोन कर लिया करंगे और पहुंचते ही खबर देंगे। 

उसी शाम उसके नये गहने कपडे देखने उसकी कुछ सहेलियां घर आयी थीं। हंसी मज़ाक के माहौल में एमन से हनीमून के बारे में भी पूछा गया मगर एमन ने जब बताया कि वो हनी मून पर कहीं नहीं गयी तो भी जैसे सबकी आंखों मे एक सवाल सा था, या शायद अब एमन को हर व्यक्ति की आंखों में सवाल दिखने लगा था। उसकी मौसी जो उनके घर से ज़्यादा दूर नहीं रहती थीं और वो पहले से ही इस रिश्ते के खिलाफ़ थीं, वो भी पहले से ज़्यादा अब घर आने लगी थीं और हर बार किसी अमेरिका में हुई शादी की दुखद कहानी सुना जाती थीं। धीरे धीरे एमन देख रही थी कि उसके घर में सभी लोग दीपक के खिलाफ़ होने लगे थे। उसका मन भी कभी कभी आशंका से भर उठता था मगर फिर जो भी होगा उसकी किस्मत है सोच कर वो दीपक के साथ बिताये सुंदर पलों को याद करने लगती थी। दीपक का अब भी फ़ोन आता था हफ़्ते में दो बार तो कई बार तीन बार भी, मगर अब उसके मां पिताजी दीपक से बात नहीं करते थे।

दो महीने हो चुके थे और वीसा एक महीने में आने की उम्मीद थी, मगर एमन के पिताजी को उसने अक्सर ही सर झुकाये चिन्ताग्रस्त देखा था। एमन अपने मां को अक्सर रोते हुये देखती थी। ससुराल पहुंच कर अपनी सास के उसके हाथ में चाभी थमाने की बात भी अब एक किस्सा बन चुकी थी। क्यों दीपक को उसकी मां ने पागल कहा होगा, क्यों दीपक के मां-बाप अक्सर बेटे के पास जाते रहते हैं और दीपक को क्यों शादी से पहले एमन से मिलने नहीं दिया गया, दीपक की तनख्वाह क्या होगी आदि आदि। एक दिन घर में चल रहे ऐसे ही तनाव के बीच एमन मां से लड पडी और कह दिया कि वो दीपक से कहेगी अपनी इन्जीनियरिंग की डिग्री भेजने।  दीपक के फ़ोन आने पर , एमन की सारी भडास उस पर निकल पडी। घर में यही बात सुनते सुनते उस के धैर्य की सीमा टूट चुकी थी । उसने कह दिया दीपक से कि उसे तो ये भी नहीं पता कि वो इन्जीनियर हैं या नहीं । गुस्से में वो जाने और भी क्या क्या कह गयी। दीपक क्यों नहीं मिलना चाहते थे उससे शादी से पहले, ज़रूर कोई बात होगी जो छुपायी जा रही है उससे, लोग तो अमेरिका में एक शादी होते हुये भी भारत आकर शादी कर लेते हैं वरना क्या बात थी कि बिना देखे ही दीपक ने उससे शादी की, क्यों उसके मां-बाप जा कर बैठे रहते हैं उसके पास और भी न जाने क्या क्या। दीपक हैरान थे अचानक इस तबदीली को देख कर। कुछ भी समझ नहीं आया दीपक को मगर अपने मां बाप के बारे में कही गयी बात उसे बुरी लगी।  थोडे दिनों बाद एमन के नाम एक रजिस्ट्री चिट्ठी में दीपक की इन्जीनियरिंग डिग्री की फ़ोटोकापी आयी थी। मगर दीपक का कोई फ़ोन नहीं आया। एमन ने एक बार कोशिश की थी फ़ोन करने की मगर दीपक उस वक्त घर पर नहीं थे और बाद में भी उनका कोई फ़ोन नहीं आया था। एमन के पिताजी अभी भी आश्वस्त नहीं थे। क्या काम करते हैं जंवाई? उनकी पे-स्लिप भेजने बोलो एक बार। मगर एमन ने कोई जवाब नहीं दिया था। वो जान चुकी थी दीपक अब उससे दूर जा चुके हैं। मगर उसके मा-बाप को भी वो दोष नहीं देती थी क्योंकि किसी भी मां-बाप के लिये अपनी बेटी का हित सोचना स्वाभाविक है। उसे कभी कभी लगता था कि कहीं उसकी मौसी की कही बात ही तो सच नहीं है और क्योंकि अब सच का पता लग चुका है दीपक ने सारे रिश्ते तोड दिये हैं। खयाल थे कि पहाड की चोटी से पताल के गर्भ तक घूम आते थे। और इधर रागेश्री की शादी भी तय हो चुकी थी।

रागेश्री की शादी अब की बार भारत के ही एक इन्जीनियर से तय की गयी थी। अच्छी तरह जांच पडताल के बाद ही रागेश्री की शादी के लिये हां की गयी थी। लडका देखने भी आया था और रागेश्री के साथ कुछ समय भी बिताया था। शादी की जल्दी सभी को थी और पंद्रह दिनों बाद ही शादी का मुहुर्त निकला था। एमन की तरह रागेश्री ने भी लाल रंग की ही बनारसी साडी चुनी थी और चुपके से आईने के सामने उस साडी की घूंघट ओढते एमन ने उसे पकड लिया था। रागेश्री भी घंटों अपने होने वाले पति से फ़ोन पर बात करती थी और एमन को सहज ही दीपक के साथ बिताये दिनों की याद आ जाती। देखते देखते पंद्रह दिन बीत गये थे और रागेश्री की शादी का दिन भी आ पहुंचा था। कर्तव्यानुसार एमन के पिता ने एक शादी का कार्ड कनाडा भेजा था मगर साथ कोई चिट्ठी नहीं भेजी थी। एमन अभिमान और शर्मिन्दगी में दीपक को फ़ोन नहीं कर पायी थी। रागेश्री की शादी के दिन भीषण बारिश हो रही थी। उसी बारिश में मंडप के नीचे जोडे को जयमाला बदलते देखकर, कहीं एमन को दीपक की मुस्कान याद आ गयी थी। रागेश्री अपने पति के साथ चली जायेगी मगर उसकी तरह वापस नहीं आयेगी घर। वो हनीमून के लिये शिमला जा रही है। जाने अब रागेश्री को वो कब देखे। रागेश्री के भी शादी की तस्वीरें खींची जायेंगी मगर उन पर टिप्पणी करने के लिये फ़ूफ़ा जी नहीं होंगे या होंगे भी मगर क्या रागेश्री पति पर अविश्वास करेगी? रागेश्री की कमी घर में तो सभी को खलेगी मगर रागेश्री को उनकी कमी उतनी नहीं खलेगी क्योंकि वो तो अपने प्रियतम के साथ होगी। यही सब सोच कर एमन की आंखों से अभिमान पानी बन कर बह निकला था झर झर। एक बार वो आज़मा के तो देखे अपनी किस्मत को। दीपक ने ऐसा क्या किया था कि उस के परिवार वालों के साथ साथ वो भी शक करने लगी थी उन पर। और उसके कदम उठ पडे थे फ़ोन की तरफ़। आज उसने अपने भाग्य की बागडोर खुद संभाल ली थी और बादल की एक तेज़ गडगडाहट के साथ ही उसका सारा डर जैसे अचानक जाता रहा था।

 


 

author: Manoshi Chatterjee