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Manoshi Hindi Page

be-bahar ghazalein

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दिल से वो काम अब नहीं लेता
दोस्ती का नाम अब नहीं लेता
 
बारी आई मेरे दिल देने की तो
कहता है दाम अब नहीं लेता
 
हम गिरे थे बडी उम्मीद से पर
हाथ कोई थाम अब नहीं लेता
 
माँगता था मेरी एक निशानी
वो जो पैग़ाम अब नहीं लेता
 
याद आयी तो वो रो लेता है
खुद से इन्तक़ाम अब नहीं लेता

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दुआ मे तेरी असर हो कैसे
गुलों का बस ये शहर हो कैसे
 
चले तो आये हो ज़िन्दगी में
मगर ज़िन्दगी बसर हो कैसे
 
नहीं है दुनिया जज़्बातों की
खडा हवा में ये घर हो कैसे
 
इश्क है प्यारे नहीं खिलौना
इतना आसां सफ़र हो कैसे
 
नहीं मानता चाँद हमारी
छुपे नहीं तो सहर हो कैसे

रहे ढूँढते हर इक तरफ़ हम
छुपा जो दिल में उधर हो कैसे
 
खफ़ा नहीं थे कभी भी तुमसे
'दोस्त' दोस्ती मगर हो कैसे
 
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वक़्त का यूँ  असर होने लगा है
आदमी रिश्ते भी ढोने लगा है
 
लिया उसने किसी दोस्त का नाम
दिल क्यों भारी सा होने लगा है
 
रंग बहता है लाल दरिया में
ख़ून रँग रग़ों में खोने लगा है
 
रुकता नहीं आँखों से ये दरिया
आस्मां भी सँग रोने लगा है
 
बात क्या है जो हर आता जाता
बातों के नश्तर चुभोने लगा है
 

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जलते रहे जो रात भर तेरी याद में
बरसे है फिर वो टूट कर तेरी याद में
 
चल पडा जो आँखों से अश्क़ों का सिलसिला
जुडते रहे ग़म इक इक कर तेरी याद में
 
उस हल्की सी हँसी में छुपा था जो दर्द
छुप सका न आँखों से वो तेरी याद में
 
टूटी थी नींद बडी तेज़ आवाज़ से
बिखरे थे ख़्वाब रात भर तेरी याद में
 
वो था नहीं अपना कभी फिर मलाल क्या
रह गये बस मुस्करा कर तेरी याद में
 
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आँख भर आये तो बहने न देना
प्यार के ग़ुरूर को ढहने न देना
 
बाद बरसों तुम्हें सोने न दे वो
बात दिल में कोई रहने न देना
 
याद रखना कभी रिश्ता था वो
इस ज़माने को कुछ कहने न देना
 
आप भी मेरी तरह रो लीजियेगा
दिल जो भर आये तो सहने न देना
 
लाख नाराज़गी रहे भी हम से
आग दिल में कोई रहने न देना

तेरे आने से जो ज़िन्दगी देखी
अंधियारे में भी रोशनी देखी

तुम्हें दे दिया हाँ जो जाने हमने
मौत दर पे ही फिर खडी देखी

कुछ तो है बात जो रात भर आज
ख्वाब और नींद में ठनी देखी

आर्ज़ू ये थी कोई नाता होता
दोस्ती मिली न दुश्मनी देखी

मांगी थी दुआयें कितनी हमने
खुदा से न आज तक बनी देखी

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हम ज़िन्दगी के साथ चलते चले गये
जैसी मिली हम उसमें ढलते चले गये

छोडा था उसने हाथ एक उम्र हो चुकी
फिर भी ख्वाब जाने क्यूँ पलते चले गये

इक उफ़ भी ना निकली ज़ुबां से उनके
हँस के निगली आग और जलते चले गये

आखिर हम ने तोड ली यादों से दोस्ती
दुश्मनी मे खुद को हम छलते चले गये

आई जो एक आँधी नया दौर कह के
कुछ लोग इसके साथ बदलते चले गये
 
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ग़ैर तुमको बना लिया हमने
ऐसे खुद को मिटा लिया हमने
 
अश्क़ आँखों में होंठों पे हँसी
ग़म को ऐसे छुपा लिया हमने
 
वो जो कहते हैं कुछ नहीं मेरे
ये भी रिश्ता निभा लिया हमने
 
बेखुदी से अब होश में रह कर
ख़ुद को जीना सिखा लिया हमने
 
सुना लेते हैं नाम मेरा वो
सुन के बस मुस्करा लिया हमने
 
जाने कितने सवाल ऐसे हैं
जिन को दिल में दबा दिया हमने
 
ज़िन्दगी से जो बनी नहीं अपनी
मौत को अपना बना लिया हमने
 

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ख़्वाहिशें अपनी दबाना नहीं
ख़्वाब आंखों में छुपाना नहीं

आग जलती रहे धुआं न उठे
इतना मासूम ज़माना नहीं

तोड ले कोई आसानी से
इतना भी तो झुक जाना नहीं

बात छेडेंगे ऐतबार की वो
राज़ उनको पर बताना नहीं

मिल जाती है मंज़िल-ए-मुहब्बत
है हकीकत ये फ़साना नहीं

है चर्चा मेरी मौत का ही
ये बुलाने का बहाना नहीं

लोग कमज़ोर समझ लेते हैं
दर्द आंखों में दिखाना नहीं

कोई आकर के रोक लेगा
इस ग़ुमां में उठ जाना नहीं

लौटे वो नहीं वापस जाकर
इतना भी तुम खुल जाना नहीं

all poems are by manoshi chatterjee